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Cat’s eye (Lahsuniya)

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Cat’s eye (Lahsuniya)

Cats Eye should only be worn upon recommendation by an astrologer who has thoroughly studied your horoscope. In Vedic astrology, Cat's Eye is the gemstone for the mythical planet 'Ketu' (also known as 'Dragon's Tail' as it is the headless lower body of the shadow planet Rahu). Cat's Eye is worn to nullify the malefic effects of Ketu in one's horoscope.

Benefits

1.       Cats Eye stone benefits most during the Dasa or the malefic phase of Ketu, the headless body of the shadow planet ‘Rahu’.

2.       Cats eye stone effects the health conditions of its wearer positively. It is believed that sudden health related traumas requiring crucial surgeries are mostly caused due to the malefic effects of Ketu in one’s horoscope and wearing cat eye stone benefits in nullifying the negative effects of Ketu.

3.       Wearing Cats Eye results in the growth of a person’s wealth and improves their financial conditions.

4.       Cats Eye gemstone benefits the business or the professional life of its wearer. It is known to revive declining Businesses or financial ventures.

5.       Cats Eye protects its wearer from road accidents, envy of their foes, debts, poverty and other such diabolical situations.

6.       Ketu is considered a spiritual and religious planet. One of the benefits of wearing cat’s eye gemstone is that a person feels content, detached from worldly desires and interested in spirituality.

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Astro Sandesh

19 सितम्बर 2017 आज आश्विन महीने के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि, पू० फाल्गुनी नक्षत्र, साध्य योग, शकुनि करण और दिन मंगलवार है I आज अमावस (पितृकार्येशु) का श्राद्ध, सर्वपितृ श्राद्ध चतुर्दशी/अमावस का श्राद्ध है I जल भरे लौटे में कच्चा दूध, जौं, तिल, कुशा, गंगाजल, जनेऊ, 1- 1 रूपये के 7 सिक्के, सफेद- पीले पुष्प यह सब सामग्री डालकर लौटे को अपने सामने रखकर पवित्र आसन पर बैठकर पितृयों को मोक्ष प्रदान करने वाले भगवान् नारायण को प्रसन्न करने वाले इस महामन्त्र का 16 बार उच्चारण करें-ॐ अनादिनिधनो देवः शंखचक्र गदाधरः I अक्षय्यः पुंडरीकाक्षो पितृमोक्षप्रदो भवः II और फिर वह जल अंजुली में लेकर इस प्रकार से डाले की वह जल अंगूठे की तरफ से गिरें I (लौटा बायें हाथ से पकडे रहें, दाहिने हाथ के अंगूठे की तरफ से जल पीपल की जड़ में गिराते रहें I) ...

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आपके आज को श्रेष्ठ बनाने की पूजा-विधि

18 सितम्बर 2017 आज आश्विन महीने के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि, मघा नक्षत्र, सिद्ध योग, वणिज करण और दिन सोमवार है I आज शस्त्र – विष - दुर्घटनादि अपमृत्यु से मृतों का श्राद्ध एवं मासशिवरात्रि व्रत है I आज ताम्बे के लौटे में जल भरकर पीले- सफेद फूल, काले- सफेद तिल, 16 दाने चावल, सफेद सूत, कच्चा दूध ये सब मिलाकर पीपल, बड और सूर्य भगवान् को चढ़ाएं I आज के पुण्य कर्म से अधोगति में पड़े हुए कुल के सारे जीवों को गति की प्राप्ति होती है जिनकी मृत्यु किसी दुर्घटना, जलने से, जहर खाके, शस्त्रघात, उंचाई से गिरने से, प्राक्रतिक विपदा जैसे बाढ़, भूकंप, बिजली का गिरने से, जिनका किसी कराणवश दाह संस्कार नहीं हो सका या पार्थिव शव न मिला हो I आज के दिन अन्य सभी शुभ कर्म भी करें जैसे- ·    गरीब, अपंग, कोडी आदि लाचार जीवों को भोजन करायें ·    गौ को चारा डालें ·    ब्राह्मणों को भोजन करायें और यथासंभव दान- दक्षिणा दें ·    प्रभु के नामों का स्मरण करें ·    गीता, भागवत, विष्णु सहस्रनाम आदि श्रेष्ठ ग्रंथों का पाठ करें ...

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आपके आज को श्रेष्ठ बनाने की पूजा-विधि

13 सितम्बर 2017 आज आश्विन महीने के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी एवं मृगशिरा नक्षत्र, वज्र एवं सिद्धि योग, बालव करण और दिन बुधवार है I आज अष्टमी का श्राद्ध, श्रीमहालक्ष्मी व्रत संपन्न, जीवित्पुत्रिका व्रत और सर्वार्थ सिद्ध योग है I महालक्ष्मी जी के 16 दिन चलने वाले जो व्रत थे उसका आज अंतिम दिन है अतः आज माँ लक्ष्मी जी की आरती कर उन्हें कुछ मीठे का जैसे खीर या हलवे का भोग लगायें और माँ से इन 16 दिन की पूजा का परिपूर्ण फल प्राप्त हो और धन- संतान में वृद्धि- समृद्धि और बरकत का आशीर्वाद मांगें और प्रसाद को परिवार के सब सदस्यों में वितरण करें I आज आठवां श्राद्ध भी है, आज के दिन स्टील के लौटे में कच्चा दूध, चावल और सफेद पुष्प मिला जल भगवान् सूर्य को और पीपल देवता को चढ़ायें I इससे मातृ पक्ष के पितृयों को संतृप्ति की प्राप्ति होगी I ...

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आपके आज को श्रेष्ठ बनाने की पूजा-विधि

भगवान श्रीकृष्ण से पक्षीराज गरुड़ ने पूछा- हे प्रभु! पृथ्वी पर लोग अपने मृत पितरों का श्राद्ध करते हैं. उनकी रुचि का भोजन ब्राह्मणों आदि को कराते हैं. पर क्या पितृ लोक से पृथ्वी पर आकर श्राद्ध में भोजन करते पितरों को किसी ने देखा भी है? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे गरुड़! तुम्हारी शंका का निवारण करने के लिए मैं देवी सीता के साथ हुई घटना सुनाता हूं. सीताजी ने पुष्कर तीर्थ में अपने ससुर आदि तीन पितरों को श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में देखा था, वह कथा सुनो. गरूड़! यह तो तुम्हें ज्ञात ही है कि श्री राम अपने पिता दशरथ की आज्ञा के बाद वनगमन कर गये, साथ में सीता भी थीं. बाद में श्रीराम को यह पता लग चुका था कि उनके पिता उनके वियोग में शरीर त्याग चुके हैं. जंगल-जंगल घूमते सीताजी के साथ श्रीराम ने पुष्कर तीर्थ की भी यात्रा की. अब यह श्राद्ध का अवसर था ऐसे में पिता का श्राद्ध पुष्कर में हो इससे श्रेष्ठ क्या हो सकता था. तीर्थ में पहुंचकर उन्होंने श्राद्ध के तैयारियां आरंभ कीं. श्रीराम ने स्वयं ही विभिन्न शाक, फल, एवं अन्य उचित खाद्य सामग्री एकत्र की. जानकी जी ने भोजन तैयार किया. उन्होंने एक पके हुए फल को सिद्ध करके श्रीरामजी के सामने उपस्थित किया. श्रीराम ने ऋषियों और ब्राह्मणों को सम्मान सहित आमंत्रित किया. श्राद्ध कर्म में दीक्षित श्रीराम की आज्ञा से स्वयं दीक्षित होकर सीताजी ने उस धर्म का सम्यक और उचित पालन किया. सारी तैयारियां संपन्न हो गयीं. अब श्राद्ध में आने वाले ऋषियों और ब्राह्मणों की प्रतीक्षा थी. उस समय सूर्य आकाश मण्डल के मध्य पहुंच गए और कुतुप मुहूर्त यानी दिन का आठवां मुहूर्त अथवा दोपहर हो गयी. श्रीराम ने जिन ऋषियों को निमंत्रित किया था वे सभी आ गये थे. श्रीराम ने सभी ऋषियों और ब्राह्मणों का स्वागत और आदर सत्कार किया तथा भोजन करने के लिये आग्रह किया. ऋषियों और ब्राह्मणों को भोजन हेतु आसन ग्रहण करने के बाद जानकी अन्न परोसने के लिए वहाँ आयीं. उन्होंने कुछ भोजन बड़े ही भक्ति भाव से ऋषियों के समक्ष उनके पत्तों के बनी थाली परोसा. वे ब्राह्मणों के बीच भी गयीं. पर अचानक ही जानकी भोजन करते ब्राह्मणों और ऋषियों के बीच से निकलीं और तुरंत वहां से दूर चली गयीं. सीता लताओं के मध्य छिपकर जा बैठी. यह क्रियाकलाप श्रीराम देख रहे थे. सीता के इस कृत्य से श्रीराम कुछ चकित हो गए. फिर उन्होंने विचार किया- ब्राह्मणों को बिना भोजन कराए साध्वी सीता लज्जा के कारण कहीँ चली गयी होंगी. सीताजी एकान्त में जा बैठी हैं. फिर श्रीरामजी ने सोचा- अचानक इस कार्य का क्या कारण हो सकता है, अभी यह जानने का समय नहीं. जानकी से इस बात को जानने पहले मैं इन ब्राह्मणों को भोजन करा लूं, फिर उनसे बात कर कारण समझूंगा. ऐसा विचारकर श्रीराम ने स्वयं उन ब्राह्मणों को भोजन कराया. भोजन के बाद ऋषियों को विदा करते समय भी श्रीराम के मस्तिष्क में यह बात रह-रहकर कौंध रही थी कि सीता ने ऐसा अप्रत्याशित व्यवहार क्यों किया? उन ब्राह्मणों के चले जाने पर श्रीराम ने अपनी प्रियतमा सीताजी से पूछा- ब्राह्मणों को देखकर तुम लताओं की ओट में क्यों छिप गई थीं? यह उचित नहीं जान पड़ा. इससे ऋषियों के भोजन में व्यवधान हो सकता था. वे कुपित भी हो सकते थे. श्रीराम बोले- हे सीते! तुम्हें तो ज्ञात है कि ऋषियों और ब्राह्मणों को पितरों के प्रतीक मान जाता है. ऐसे में तुमने ऐसा क्यों किया? इसका कारण जानने की इच्छा है. मुझे अविलम्ब बताओ. श्री राम के ऐसा कहने पर सीता जी मुँह नीचे कर सामने खड़ी हो गयीं और अपने नेत्रों से आँसू बहाती हुई बोलीं- हे नाथ ! मैंने यहां जिस प्रकार का आश्चर्य देखा है, उसे आप सुनें. इस श्राद्ध में उपस्थित ब्राह्मणों की अगली पांत में मैंने दो महापुरुषों को देखा जो राजा से प्रतीत होते थे. ऋषियों, ब्राह्मणों के बीच सजे धजे राजा-महाराजा जैसे महापुरुषों को देख मैं अचरज में थी. तभी मैंने आपके पिताश्री के दर्शन भी किए. वह भी सभी तरह के राजसी वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित थे. आपके पिता को देखकर मैं बिना बताए एकान्त में चली आय़ी थी. मुझे न केवल लज्जा का बोध हुआ वरन मेरे विचार में कुछ और भी अया तभी निर्णय लिया. हे प्रभो! पेड़ों की छाल वल्कल और मृगचर्म धारण करके मैं अपने स्वसुर के सम्मुख कैसे जा सकती थी? मैं आपसे यह सत्य ही कह रही हूं. अपने हाथ से राजा को मैं वह भोजन कैसे दे सकती थी, जिसके दासों के भी दास कभी वैसा भोजन नहीं करते? मिट्टी और पत्तों आदि से बने पात्रों में उस अन्न को रखकर मैं उन्हें कैसे देती? मैं तो वही हूँ जो पहले सभी प्रकार के आभूषणों से सुशोभित रहती थी और आपके पिताश्री मुझे वैसी स्थिति में देख चुके थे. आज मैं इस अवस्था में उनके सामने कैसे जाती? इससे उनके मन को भी क्षोभ होता. मैं उनको क्षोभ में कैसे देख सकती थी? क्या यह कहीं से उचित होता? इन सब कारणों से हुई लज्जा के कारण मैं वापस हो गयी और किसी की दृष्टि न पड़े इस लिए सघन लता गुल्मों में आ बैठी. गरुड़जी बोले- हे भगवन आपकी इस कथा से मेरी शंका का उचित निवारण हो गया कि श्रद्धा में पितृगण साक्षात प्रकट होते हैं और वे श्राद्ध का भोजन करने वाले ब्राह्मणों में उपस्थित रहते हैं. (गरूड़ पुराण से) ...

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क्या श्राद्ध ग्रहण करने पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं पितर? गरूड़ पुराण से जानिए